भारत की प्रलेख (डाक्यूमेंटरी) विरासत का संरक्षण

      पाण्डुलिपियां, भारत की प्रलेख विरासत का एक बहुमूल्य भाग हैं। वे अपने में विचार, उपलब्धियां, अनुभव और इतिहास से प्राप्त अनुभवों को समाहित किए हुए हैं, अन्य शब्दों में वे हमारी “स्मृतियां” हैं। राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन ने यूनेस्को के मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर में शामिल करने हेतु भारतीय पाण्डुलिपियों को नामित करने की पहल शुरू की है। इस कार्यक्रम के तहत यूनेस्को विश्व को बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रलेख विरासत की पहचान देता है और इसके संरक्षण तथा इसकी वैश्विक पहुंच की सुविधा देता है। इसके अतिरिक्त, इन रिकॉर्डों के महत्त्व की जागरूकता को बढ़ाने के लिए प्रयास किए जाते हैं।

      पॉण्डिचेरी में शैव पाण्डुलिपि को फ्रैंच इंस्टीट्यूट ऑफ पॉण्डिचेरी, सेंटर फॉर इकॉल फ्रैंचाइज डी’एक्सट्रीम-ओरिएंटे (ईएफईओ) और राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन द्वारा संयुक्त रूप से प्रस्तुत आवेदन के आधार पर वर्ष 2005 में यूनेस्को मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड का दर्जा दिया गया था।

      मिशन ने यूनेस्को को दो नामांकन प्रस्तुत किए थे:
      • भंडारकर ओरिएंटल अनुसंधान संस्थान, पुणे में ऋग्वेद पाण्डुलिपियों का संग्रह।
      • राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली और पुरातत्त्व, अभिलेखागार संग्रहालय विभाग, जम्मू और कश्मीर में गिलगिट पाण्डुलिपियां।
      ऋग्वेद पाण्डुलिपियों को “मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड” घोषित करना

      भंडारकर ओरिएंटल अनुसंधान संस्थान, पुणे से ऋग्वेद पाण्डुलिपियों को यूनेस्को के “मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड” रजिस्टर, 2007 में शामिल करने हेतु नामित किया गया है। मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड संबंधी कार्यक्रम, 15 वर्ष पहले, यूनेस्कों में प्रलेख विरासत में महत्त्वपूर्ण सामग्रियों का सम्मान करने तथा विश्व की विरासत के रूप में अपने “मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड” में उन्हें दर्ज करने के लिए शुरू किया गया था। “मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड” कार्यक्रम में सामूहिक स्मृति लोप से बचाने, उनका व्यापक प्रसार सुनिश्चित करते हुए मूल्यवान पुरालेख संबंधी सामग्रियों और विश्व के पुस्तकालय संग्रहों की सुरक्षा शामिल है। भंडारकर ओरिएंटल अनुसंधान संस्थान, पुणे की ओर से राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन ने मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कार्यक्रम के लिए ऋग्वेद पाण्डुलिपियों का नामांकन प्रस्तुत किया था।

      अब तक, भारत ने रजिस्टर पर किए तीन अन्य नामांकन अंकित हैं

      • आई.ए.एस. तमिल मेडिक मैनुस्क्रिप्ट कलेक्शन (1997)
      • ऑर्काइव्स ऑफ द डच ईस्ट इंडिया कंपनी (2003-डच नामांकन)
      • पॉण्डिचेरी में शैव पाण्डुलिपियां (2005)

      वेद, मानव इतिहास में पहले साहित्यिक दस्तावेज हैं। पहले इसे सदियों तक मौखिक परंपरा के रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आगे बढ़ाया जाता था। इस मूल्यवान पुरातन विश्व सम्पदा को भारत के विभिन्न भागों में पाण्डुलिपियों के रूप में संरक्षित किया गया है।

       

      भंडारकर ओरिएंटल अनुसंधान संस्थान, पुणे में रखी गई कुल 28000 पाण्डुलिपियों में से ऋग्वेद की 30 पाण्डुलिपियां, संग्रह का एक मूल्यवान भाग हैं। इन पाण्डुलिपियों में अन्यों के साथ लिपियों स्वरोच्चारण पहचान तथा उपयोग की गई सहायता सामग्री के रूप में कई खास विशेषताएं शामिल हैं। यहां तक कि, अग्रणी भारतविद प्रो. एफ. मैक्समूलर ने भी इन ऋग्वेद पाण्डुलिपियों में से एक को संदर्भित किया है जोकि वर्तमान में संस्थान में हैं। वैदिक अध्ययन के लिए पुणे में एक प्रमुख संस्थान, वैदिक संशोधन मंडल द्वारा ऋग्वेद के प्रसिद्ध महत्त्वपूर्ण संस्करण तैयार करने के लिए ऋग्वेद पाण्डुलिपियों के इस संग्रह की सामग्री को भी उपयोग किया गया था। ये पाण्डुलिपियां न केवल भारत, बल्कि विश्व की बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत के खास उदाहरणों के रूप में बहुत ही मूल्यवान हैं।

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      यूनेस्को ने भारत में वेदों की मौखिक परंपरा

      “मानवता की मौखिक और अमूर्त विरासत की श्रेष्ठ कृति” के रूप में घोषित किया था

      वेदों के पारंपरिक पाठ को मंत्रोच्चार के रूप में जाना जाता है, चूंकि पुरातन काल से यह परंपरा मौखिक पाठ पद्धति अथवा मंत्रोच्चार के रूप में भावी पीढ़ियों को आगे बढ़ायी गई थी।

      वेद मुख्य रूप से ज्ञान के स्रोत हैं जिसे श्रुति साहित्य के रूप में जाना जाता है। प्राचीन काल में वेदों का मात्र पाठ किया जाता था, लिखा नहीं जाता था। वह आदि शंकर थे जिन्होंने इन ग्रंथों को लिखित रूप में सृजित किया था।

      यूनेस्को ने वैदिक मंत्रोच्चार को “मानवता की विरासत” घोषित किया था। 7 नवंबर, 2013 को पेरिस में जूरी सदस्यों की बैठक में श्री कोईचीरो मात्सुरा, यूनेस्को के महानिदेशक ने भारत में वेदों के मंत्रोच्चारण को विरासत तथा सांस्कृतिक विचारों का अनूठा उदाहरण घोषित किया था।

      “पारंपरिक वैदिक मंत्रोच्चारण” के बारे में यूनेस्को का कथन।

      मानवीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची (मूलरूप से 2003 मे घोषित) में वर्ष 2008 में उत्कीर्ण वेदों में, संस्कृत कविता. दार्शनिक वक्तव्य, मिथक और 3500 वर्ष पहले आर्यों द्वारा विकसित एवं रचित आनुष्ठानिक मंत्रों का व्यापक कोष शामिल है। हिन्दुओं द्वारा वेदों को ज्ञान का प्रमुख स्रोत और उनके धर्म की पवित्र नींव के रूप में माना जाता है, वेदों का अस्तित्व, विश्व की सबसे पुरानी जीवित सांस्कृतिक परंपराओं में से एक है। वैदिक विरासत में चार वेदों में संग्रहीत बड़ी संख्या में पाठ और व्याख्या शामिल है, जिसे सामान्यतः “ज्ञान की पुस्तक” के रूप में जाना जाता है, यद्यपि वे मौखिक रूप में फैले हैं। ऋग्वेद पवित्र श्लोकों का संकलन है, साम वेद ऋग्वेद और अन्य स्रोतों से श्लोकों की संगीतमय परंपरा है, यजुर्वेद पुजारी द्वारा उपयोग की गई प्रार्थनाओं और बलिदान विषयक सूत्रों से भरा पड़ा है और अथर्वेवेद में जादू और मंत्र शामिल हैं। वेद, हिन्दु धर्म और विभिन्न कलात्मक, वैज्ञानिक तथा दार्शनिक अवधारणाओं जैसे शून्य की अवधारणा, के शुरूआती विकास के इतिहास को भी बयां करते हैं। वैदिक भाषा, जिसे लोक (क्लासिकल) संस्कृत से लिया गया है, में व्यक्त वेदों के छंद पारंपरिक रूप से पवित्र धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान गाए जाते थे और वैदिक समुदायों में दैनिक रूप से पढ़े जाते थे। इस परंपरा का मूल्य न केवल इसके समृद्ध मौखिक साहित्यिक सामग्री में है बल्कि हजारों वर्षों तक संरक्षित करते हुए पाठ को अक्षुण्ण रखने में ब्राह्मण पुजारियों द्वारा प्रयोग की गई स्वदेशी तकनीकों में भी है। यह सुनिश्चित करने हेतु कि प्रत्येक शब्द का उच्चारण अपरिवर्तित रहे, शिक्षार्थियों को बचपन से उच्चारण तकनीकें सिखाई जाती हैं, जो कि तान आधारित उच्चारण, प्रत्येक वर्ण के उच्चारण की खास पद्धति और विशिष्ट बोली संयोजन पर आधारित होती हैं। यद्यपि वेद लगातार समकालीन भारतीय जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं, लेकिन एक हजार से अधिक वैदिक पाठ में से मात्र तेरह शाखाएं जीवित है। इसके अतिरिक्त, चार प्रसिद्ध स्कूलों- महाराष्ट्र (मध्य भारत), केरल और कर्नाटक (दक्षिणी भारत) तथा ओड़िशा (पूर्वी भारत) पर आसन्न खतरा माना जाता है।

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      रामलीला, रामायण का पारंपरिक अभिनय

       

      मानवीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (3.COM) की प्रतिनिधि सूची (मूलरूप से 2005 मे घोषित) में वर्ष 2008

      रामलीला, वस्तुतः “राम कथा”, दृश्यों की श्रृंखला में तत्कालीन “रामायण महाकाव्य” का अभिनय है, जिसमें गीत, वृत्तान्त, आख्यान और संवाद शामिल हैं। इसका अभिनय शरद ऋतु में धार्मिक कैलेण्डर के अनुसार प्रत्येक वर्ष आयोजित दशहरा उत्सव के दौरान उत्तर भारत में किया जाता है। सबसे अधिक प्रतिनिधित्वमूलक रामलीलाओं में अयोध्या रामनगर और बनारस, वृन्दावन, अल्मोड़ा, सतना और मधुबनी हैं। इस तरह की रामायण का मंचन रामचरित मानस पर आधारित होता है, जो कि देश के उत्तर में कहानी कहने के सबसे प्रसिद्ध रूपों में से एक है। यह पवित्र ग्रंथ रामायण के नायक, राम की गौरव गाथा को समर्पित है, इसकी रचना तुलसी दास जी ने सोलहवीं शताब्दी में हिन्दी में की थी, ताकि सभी को संस्कृत महाकाव्य सुलभ हो सके। अधिकतर रामलीला दस से बारह दिनों तक चलने वाली अभिनय श्रृंखला के माध्यम से राम चरित मानस को प्रस्तुत करती हैं। लेकिन कुछ, जैसे, रामनगर वाले, महीने भर तक अभिनय करते हैं। राम के वनवास से लौटने की खुशी मनाते हुए दशहरे के मौसम में सैंकड़ों स्थानों, कस्बों और गाँवों में उत्सव मनाए जाते हैं। रामलीला में राम और रावण के बीच की लड़ाई दिखाई जाती है और इसमें भगवान, ऋषियों तथा अन्य पात्रों के बीच संवाद की एक श्रृंखला शामिल होती है। रामलीला की नाटकीय शक्ति आइकनों से उत्पन्न होती है, जो प्रत्येक दृश्य की चरम सीमा का प्रतिनिधित्व करते हैं। दर्शकों को गाने तथा आख्यान में भाग लेने के लिए बुलाया जाता है। रामलीला सभी लोगों को उनकी जाति, धर्म अथवा उम्र में भेदभाव के बगैर एकसाथ जोड़ती है। सभी गाँव वासी स्वेच्छा से विभिन्न भूमिका निभाने अथवा इससे संबंधित विभिन्न कार्यकलापों जैसे मास्क और पोशाक बनाने तथा मेकअप, पुतला तैयार करने और प्रकाश व्यवस्था में भाग लेते हैं। तथापि, व्यापक जनसंचार के विकास, खासकर टेलीविज़न धारावाहिक, के कारण रामलीला आयोजन में दर्शकों की कमी आई है, इससे वे लोग और समुदायों को एक साथ लाने की अपनी मूल भूमिका को खो रहे हैं।